ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के सरकारी आदेश के खिलाफ दाखिल हुई PIL, 22 जून को होगी अगली सुनवाई
प्रयागराज। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ग्राम पंचायत चुनावों से पूर्व वर्तमान ग्राम प्रधानों को अधिकतम छह माह तक प्रशासक नियुक्त किए जाने के निर्णय को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। यह जनहित याचिका (PIL) ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज, प्रयागराज के बी.ए. एलएल.बी. तृतीय वर्ष के छात्र आयुष पाण्डेय एवं युधिष्ठिर वर्मा द्वारा दाखिल की गई है।
याचिका में 26 मई 2026 को जारी उत्तर प्रदेश सरकार के उस आदेश को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है, जिसके माध्यम से ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद वर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने की अनुमति दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243E की मूल भावना के विपरीत है, जिसमें पंचायतों के लिए पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल निर्धारित किया गया है तथा अगले पंचायत चुनाव समय से कराना अनिवार्य बताया गया है।
याचिका के अनुसार वर्ष 2021 में निर्वाचित ग्राम पंचायतों की पहली बैठक 27 मई 2021 को आयोजित हुई थी, जिसके आधार पर उनका संवैधानिक कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो गया। इसके बावजूद राज्य सरकार ने एक आदेश जारी कर निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ग्राम पंचायतों का प्रशासक नियुक्त करने का निर्णय लिया।
याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय ‘Prem Lal Patel बनाम State of Uttar Pradesh’ का भी उल्लेख किया है। उनका दावा है कि इस निर्णय में न्यायालय ने पंचायत चुनावों को टालने और प्रशासकों की नियुक्ति से संबंधित प्रावधानों को संविधान के विरुद्ध माना था।
याचिका में यह भी कहा गया है कि “अपरिहार्य परिस्थितियां” और “लोकहित” जैसे शब्दों का प्रयोग अत्यंत व्यापक और अस्पष्ट है, जिनके आधार पर चुनाव स्थगित करने की शक्ति सरकार को देना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मनमानी को बढ़ावा देता है।
मामले की सुनवाई 4 जून 2026 को माननीय न्यायमूर्ति एस. डी. सिंह की पीठ के समक्ष हुई। न्यायालय ने याचिका को विचारणीय मानते हुए अगली सुनवाई के लिए 22 जून 2026 की तिथि निर्धारित की है। अगली सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर की पीठ के समक्ष होगी।
यह मामला उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों, स्थानीय स्वशासन और संवैधानिक लोकतंत्र से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने लाता है। अब 22 जून को होने वाली सुनवाई पर कानूनी विशेषज्ञों, पंचायत प्रतिनिधियों और राजनीतिक हलकों की नजरें टिकी हुई हैं।

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